करीबन 11 साल पहले मुझे एक साथी मिली थी , मेरी डायरी .. । तमाम पन्नों पे उसके ,मैंने अपनी ज़िन्दगी जिल्दबंद की थी । पता नहीं चला कब वो मुझसे इतना दूर हो गई थी .. और पता कब चला ? जब फिर से एक बेचैनी ने मुझे घेर लिया था , और बहुत कुछ मुझमे ही दफ़न हो चुका था।
उस से बहुत किस्से कहे और सुने थे मैंने .. कुछ खुशियाँ कुछ ग़म भी बांटे थे ,न जाने उसका साथ कब छूटा ,
वो डायरी जो अपने पन्नों पे मेरे इतने किस्सों को संभाले रखती थी .. अब कुछ दूरियां सी बन गयी थी हमारे बीच .. इसी दौरान ये ब्लॉग का नया माध्यम मिला है .. देखें इसका मेरा साथ कब तक रहता है ..
तेरे खयालो में जो तस्वीर है मेरी .. कुछ रंग अजब हैं उसमे , तुमने ही भरे हों शायद .. कुछ रंग गायब हों गए हैं अब.. तुमने बदले थे क्या ? कभी मैं आइना देखता हूँ कभी ये तस्वीर तुम्हारी आँखों में .. दो मुख्तलिफ़ सी शख्सियतें दिखती हैं.. या मेरा आइना झूठा है या ये तस्वीर पुरानी है ...
वो कौन सा गाँव था ? याद नहीं मुझे ... जहाँ से गुज़रते हुए तुम्हें पहली दफा देखा था .. उस गाँव से अब भी मैं घर नहीं लौट पाता ... रास्ते होते कुछ हैं , याद कुछ और होते हैं ..
शुरू बहुत जल्दी होते थे , सिमटे नहीं थे बस वो दिन थे कुछ जो बंजारों से भटकते थे .. ख्वाइशों की ईंट से जो आशियाने गढ़ते थे .. वो दिन हैं आज भी जो शाम होने से डरते हैं ..
तुम्हें याद है ? एक बड़ा सा हॉल था , और मेरी नज़र सिर्फ़ तुम से घिरी थी तुम सफ़ेद सी इक धुंध में लिपट कर आई थीं ... उस धुन्ध में सिमटकर आज भी मेरे सपने सोते हैं ..