Saturday, December 29, 2012

एक दर्द था अदा करने को ..

एक लफ्ज़ था बयाँ करने को .. 

जिस्म जिल्दबन्द , अलफ़ाज़ दफ़्न हैं अब मेरे

Wednesday, December 19, 2012

खून ? किसका ?

एक तस्वीर पे कुछ खरोचें थीं।।
छू के देखा तो ,खून सा बहता था कुछ।।
तमाम मरहम पट्टी करके जब घर लौटा ,
तो मालूम हुआ अपनी ही उंगली  कटी  थी।