Friday, September 28, 2012

वो रास्ते , वो दिन




वो कौन सा गाँव था ? याद नहीं मुझे ...
जहाँ से गुज़रते हुए तुम्हें पहली दफा देखा था ..
उस गाँव से अब भी मैं घर नहीं लौट पाता ...
रास्ते होते कुछ हैं , याद कुछ और होते हैं ..

शुरू बहुत जल्दी होते थे , सिमटे नहीं थे बस
वो दिन थे कुछ जो बंजारों से भटकते थे ..
ख्वाइशों की ईंट से जो आशियाने गढ़ते थे ..
वो दिन हैं आज भी जो शाम होने से डरते हैं ..

तुम्हें याद है ? एक बड़ा सा हॉल था ,
और मेरी नज़र सिर्फ़ तुम से घिरी थी
तुम सफ़ेद सी इक धुंध में लिपट कर आई थीं ...
उस धुन्ध में सिमटकर आज भी मेरे सपने सोते हैं ..