तुम्हें नाराज़ करना मुझें भाता तो नहीं ,पर तुम्हारी नाराज़ नजरों की धूप में साँस कुछ खुल के आती है ।तो ये रूठना मनाना चलता रहेगा, आखिर तुम्हारे गुस्से में मुझे अपनेपन की ख़ुशबू जो आती है।
परुष्णि
Sunday, September 15, 2013
Sunday, January 6, 2013
बहुत सहेजो तो कुछ यादें खो ही जाती हैं .. .
आज फिर उस अलमारी को सहेजना चाहा ..
दराज़ में से कुछ सिक्के मिले ,
जो कुछ ख़ास लेने के लिए बचाए थे ..
कुछ ख़त मिले , कुछ मेरे नाम के ,
कुछ ऐसे जो कभी पोस्ट नहीं हुए थे ..
कुछ कतरन हैं ,
अब याद नहीं क्यों संभाली थी ..
फेकते हुए उन्हें फिर भी डर लगता है ..
सूखे ग़ुलाब दफ्न हैं डायरी में ..
कुछ यादों की जान इनमे रहती है .
उम्र के ऐसे तामाम कतरे बिखरे हुए हैं ..
आज फिर से उसको बंद ही रखना ही ठीक समझा ..
बिखरी हुई अलमारी जिंदा तो रहती है ..
बहुत सहेजो तो कुछ यादें खो ही जाती हैं .. .
Saturday, December 29, 2012
Wednesday, December 19, 2012
खून ? किसका ?
एक तस्वीर पे कुछ खरोचें थीं।।
छू के देखा तो ,खून सा बहता था कुछ।।
तमाम मरहम पट्टी करके जब घर लौटा ,
तो मालूम हुआ अपनी ही उंगली कटी थी।
छू के देखा तो ,खून सा बहता था कुछ।।
तमाम मरहम पट्टी करके जब घर लौटा ,
तो मालूम हुआ अपनी ही उंगली कटी थी।
Sunday, October 28, 2012
एक साथ छूटा , एक नया साथ मिला
करीबन 11 साल पहले मुझे एक साथी मिली थी , मेरी डायरी .. । तमाम पन्नों पे उसके ,मैंने अपनी ज़िन्दगी जिल्दबंद की थी । पता नहीं चला कब वो मुझसे इतना दूर हो गई थी .. और पता कब चला ? जब फिर से एक बेचैनी ने मुझे घेर लिया था , और बहुत कुछ मुझमे ही दफ़न हो चुका था।
उस से बहुत किस्से कहे और सुने थे मैंने .. कुछ खुशियाँ कुछ ग़म भी बांटे थे ,न जाने उसका साथ कब छूटा ,
वो डायरी जो अपने पन्नों पे मेरे इतने किस्सों को संभाले रखती थी .. अब कुछ दूरियां सी बन गयी थी हमारे बीच ..
इसी दौरान ये ब्लॉग का नया माध्यम मिला है .. देखें इसका मेरा साथ कब तक रहता है ..
इसी दौरान ये ब्लॉग का नया माध्यम मिला है .. देखें इसका मेरा साथ कब तक रहता है ..
Friday, October 26, 2012
तेरी कमी सी महसूस होती है ..
छुट्टी वाली दोपहर की अंगड़ाइयो में..
बिसरी यादों को टटोलती तन्हाइयों में ..
सुलझे अनसुलझे ख्यालों की रानाइयों मे ं ..
तेरे मस की कमी सी महसूस होती है ..
झिझकते सूरज की ठिठकती बारात में ..
उमस-भरी शाम को भिगाती बरसात में.
हर कदम हर पहर पे ठहरती सी रात में ..
एक कोशिश की कमी सी महसूस होती है
चमकते हुए तमाम जश्न और जिनान में ..
तेरी कशिश की कमी सी महसूस होत्ती है ..
मेरी आवारगी के सब ठिकानों में ..
तेरी इक झलक की कमी सी महसूस होती है ..
तेरी कमी सी महसूस होती है ..
Thursday, October 4, 2012
तस्वीर
तेरे खयालो में जो तस्वीर है मेरी ..
कुछ रंग अजब हैं उसमे , तुमने ही भरे हों शायद ..
कुछ रंग गायब हों गए हैं अब.. तुमने बदले थे क्या ?
कभी मैं आइना देखता हूँ कभी ये तस्वीर तुम्हारी आँखों में ..
दो मुख्तलिफ़ सी शख्सियतें दिखती हैं..
या मेरा आइना झूठा है या ये तस्वीर पुरानी है ...
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