तेरी कमी सी महसूस होती है ..
छुट्टी वाली दोपहर की अंगड़ाइयो में..
बिसरी यादों को टटोलती तन्हाइयों में ..
सुलझे अनसुलझे ख्यालों की रानाइयों मे ं ..
तेरे मस की कमी सी महसूस होती है ..
झिझकते सूरज की ठिठकती बारात में ..
उमस-भरी शाम को भिगाती बरसात में.
हर कदम हर पहर पे ठहरती सी रात में ..
एक कोशिश की कमी सी महसूस होती है
चमकते हुए तमाम जश्न और जिनान में ..
तेरी कशिश की कमी सी महसूस होत्ती है ..
मेरी आवारगी के सब ठिकानों में ..
तेरी इक झलक की कमी सी महसूस होती है ..
तेरी कमी सी महसूस होती है ..
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